रोशन लाल अग्रवाल
आज समाज
में अनेक
नए-नए विवाद
खड़े हो रहे
हैं और सारे
विवादों की जड़
में भयानक
आर्थिक विषमता
है। जब तक
आर्थिक न्याय
की स्थापना
नहीं होगी
तब तक कोई
भी विवाद
सुलझने वाला
नहीं है।
इसका स्पष्ट
कारण यह है
कि यह भारी
आर्थिक विषमता
पूरे समाज
के ताने-बाने
को नष्ट
कर रही
है। देश
की संसद
सरकार न्यायपालिका
और प्रेस
की स्वतंत्रता
सब कुछ
आर्थिक विषमता
की गुलाम
बन कर रह
गई हैं
और देश
की विशाल
जनता को धोखा
दे रही
है।
लोकतंत्र के
नाम पर
कुछ अति
संपन्न लोग
सारी संवैधानिक
व्यवस्थाओं का
खुला दुरुपयोग
कर रहे
हैं और
पूरी व्यवस्था
का व्यापक
जनहित से
कोई लेना
देना नहीं
रह जाने
के कारण
एक हास्यास्पद
स्थिति पैदा
होती जा
रही है।
इसलिए विद्वानों
और चिंताओं
को चाहिए
कि सबसे
पहले समाज
में आर्थिक
न्याय की
स्थापना पर
विचार करें
इसके अभाव
में किसी
भी प्रकार
की व्यवस्था
को सुधारने
का कोई
भी प्रयास
सफल नहीं
हो सकता।
समाज को
इस बात
की ओर
ध्यान देना
चाहिए कि
जिस व्यवस्था
में देश
की सारी
संपत्ति मुट्ठी
भर लोगों
के हाथों
में आ चुकी
हो और
देश की
अधिकांश जनता
इन्हीं मुट्ठी
भर लोगों
की गुलाम
बनकर जीने
को मजबूर
हो उसे
लोकतंत्र कहना
क्या जनता
का मजाक
उड़ाना नहीं
है?
देश की
पूरी व्यवस्था
पर धन
का प्रभाव
स्पष्ट रूप
से देखा
और समझा
जा सकता
है। लेकिन
उसके प्रति
समाज में
उचित चिंता
दिखाई भी
नहीं पड़
रही है
यह अत्यंत
आश्चर्यजनक बात
है।
बड़े-बड़े
मंचों पर
आर्थिक विषमता
पर आलोचनाएं
तो खूब
होती हैं
लेकिन समाधान
पर कोई
चर्चा नहीं
होती जबकि
समाज को
समाधान की
ही ज़रूरत
होती है।
उल्लेखनीय बात
यह है
कि इस
समस्या का
समाधान बहुत
ही सरल
है। यदि
देश में
अमीरी रेखा
बनाई जाए
और उससे
अधिक संपत्ति
पर ब्याज
की दर
से संपत्ति
कर लगा
कर उससे
मिलने वाले
अतिरिक्त शुद्ध
लाभ को
यदि देश
के सारे
नागरिकों में
लाभांश के
रूप में
बराबर बराबर
बांट दिया
जाए तो
इससे अनेक
जटिलतातम समस्याएं
पूरी तरह
समाप्त की
जा सकती
हैं।
इस व्यवस्था
के प्रति
समाज में
असंतोष का
मुख्य कारण
यही है
कि इससे
पैदा होने
वाला शुद्ध
लाभ देश
के सारे
नागरिकों को
समान रूप
से नहीं
मिलता। यह
शुद्ध आर्थिक
लाभ देश
के सभी
नागरिकों को
नागरिक भत्ते
के रूप
में समान
रूप से
मिलना ही
चाहिए और
यही सारी
समस्याओं का
निरापद समाधान
है।

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