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| Courtesy IBTimes |
रोशन लाल अग्रवाल
लोकसभा चुनाव सिर पर आते जा रहे हैं और देश के नागरिक इस बात से परेशान है वे अपना वोट किसे दें? क्योंकि उन्हें कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है कि वे किसे सत्ता सौंपे।
यह एक चिंताजनक स्थिति है लेकिन दुर्भाग्य है की अपने आप को बुद्धिजीवी कहने वाले लोग इसमें आम लोगों की कोई सहायता नहीं करते और पूरी जिम्मेदारी केवल राजनेताओं की मान ली गई है। अपने आप को बुद्धिजीवी कहलाना पसंद करने वाले लोग भी राजनेताओं की तरह ही केवल दलीय गठजोड़ और उसकी संभावनाओं की बातें कर रहे हैं किंतु वे लोग ना तो जन समस्याओं से संबंध रखने वाले कोई वास्तविक मुद्दे उठा रहे हैं और ना ही किसी समस्या का समाधान करने के लिए जनता को प्रेरित कर रहे हैं।
लेकिन जहां तक राजनेताओं का सवाल है तो उनकी भूमिका भी अत्यंत घटिया है। जहां तक सत्ता में बैठी भाजपा सरकार का सवाल है तो वह अपनी योजना को बहुत ही सोचे समझे ढंग से आगे बढ़ा रही है लेकिन दूसरे दल उससे सहमत नहीं है किंतु वे जनता के सामने अपनी कोई वैकल्पिक सोच नहीं रखते और अर्थहीन आलोचना के सहारे चुनाव की वैतरणी पार कर लेना चाहते हैं। यह पूरी तरह मूर्खतापूर्ण है और इसका परिणाम भी आसानी से समझा जा सकता है। आखिर देश की जनता करे भी तो क्या करें?
नेताओं की बयानबाजी यों और अखबारों को देखें तो सभी जगह पुलवामा में आतंकवादियों द्वारा देश के जवानों पर किया गया भयानक हमला है और यही मुद्दा आज समाज में छाया हुआ है ऐसी स्थिति में यह बात स्पष्ट है कि इसका प्रभाव लोकसभा चुनावों पर भी पड़ेगा किंतु क्या यह चुनाव का कोई मुद्दा है और यदि इसे मुद्दा बनाया भी जाए तो केवल यही होना चाहिए कि इस प्रकार के हमलों से देश की रक्षा कैसे हो सकती है और मसूद अजहर जैसे आतंकवादी को कैसे पकड़ा जा सकता है किंतु यह किसी की भी चिंता का विषय नहीं है।
यह सब लोग जानते हैं कि देश की सबसे प्रमुख समस्या गरीबी है और बेरोजगारी की समस्या भी उसी का परिणाम है देश में बढ़ रही आर्थिक असमानता भी सब को स्पष्ट दिखाई दे रही है लेकिन ऐसा नहीं लगता कि कोई राजनीतिक दल गंभीरता पूर्वक इस पर विचार कर रहा हो या कोई बुद्धिजीवी इस दिशा में किसी प्रकार का कोई समाधान प्रस्तुत कर रहे हो उस इससे यही लगता है कि सब लोगों की नजर केवल सत्ता हथियाने तक ही रहती है। पिछले वर्षों में लगातार भाजपा पर आरोप लगाने वाले लोग अपना कोई वैकल्पिक चिंतन क्यों प्रकट नहीं करते?
सपा बसपा और राजद की पार्टी में भी नीतिगत दृष्टि से भी कोई सोच दिखाई नहीं देती और केवल आपस में सीटों का समझौता करके भाजपा को चुनौती देने के सपने देख रही है यहां तक कि वे कांग्रेस को भी अपना सहभागी नहीं बनाना चाहती क्योंकि असली बात भाजपा को चुनौती देने की नहीं है बल्कि खुद सत्ता में आने की है। यदि इनका उद्देश्य वास्तव में भाजपा का विकल्प देना होता तो कांग्रे स्कोर गठजोड़ से अलग रखने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता।
जहां तक कांग्रेस का सवाल है उसकी स्थिति बहुत ही शोचनीय है आज भी कांग्रेस के पास कुछ विचार वाले लोग बचे हुए हैं लेकिन उनकी कोई भूमिका ही नहीं है और कांग्रेश की नाव राहुल प्रियंका और सुरजेवाला के भरोसे नहीं चल सकती यह स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ रहा है।
जहां तक मोदी सरकार का सवाल है तो राजनीति क्षेत्र में उनकी सक्रियता स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ रही है पूरी दुनिया में जिस प्रकार मोदी जी ने सक्रियता दिखाई है वह अभूतपूर्व है इसके पहले शायद ही किसी दूसरे प्रधानमंत्री ने दुनिया के विभिन्न देशों में कितने दौरे किए हो उससे क्या मिला यह विचारणीय विषय हो सकता है लेकिन इसकी आलोचना करने वालों को मूर्ख या धूर्त कहने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं रह जाता।
जहां तक देश की आर्थिक नीतियों का सवाल है तो मैं मानता हूं कि मोदी सरकार भी उसमें विफल ही रही है देश के तीन महत्वपूर्ण राज्यों में हुए विधानसभा के चुनावों में भाजपा की हार का एकमात्र कारण किसानों की आर्थिक दुर्दशा के कारण उनका भाजपा के विरोध में अपना वोट देना है किंतु किसानों की कर्ज माफी या कृषि उपज के मूल्य की बात किसानों के साथ किया गया छल माना जाएगा। क्योंकि इस प्रकार से किसानों की किस्मत नहीं बदली जा सकती।
इसलिए आज की स्थिति में समाज का भला चाहने वाले उन विचार वन नागरिकों से ही यह आशा की जानी चाहिए कि वह सत्ता के लिए शर्मनाक ढंग से चालें चल रहे लोगों से हटकर जनता को समझदार बनाने की कोशिश करें तानती देश का भविष्य उज्जवल हो और सारा देश एकमत होकर अपने शत्रुओं का भी मुकाबला कर सके।
मेरा मानना है कि देश की असली समस्या केवल आर्थिक अन्याय है और गरीबी अभाव और बेरोजगारी जैसी कई समस्याएं मूल रूप से आर्थिक अभाव का ही परिणाम है समान शिक्षा की बात हो या सस्ती चिकित्सा की बात हो इनका संबंध समाज में फैली गंभीर आर्थिक असमानता से है क्योंकि यदि देश में भयानक आर्थिक असमानता नहीं होती तो इस प्रकार के प्रश्न उठते ही नहीं।
लेकिन दुर्भाग्य है कि इस प्रकार के अनेक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाने वाले लोग गरीबी के मूल कारणों पर विचार नहीं करते और केवल सरकार पर दबाव डाल कर समस्याओं को हल करना चाहते हैं क्या यह उनकी बुद्धि का दिवालियापन नहीं है यदि देश में सब लोग गरीबी से मुक्त हो जाते तो फिर सब लोग अपनी समस्याओं को खुद ही हल करने में समर्थ हो जाते लेकिन इनका समाधान करने के लिए सरकार पर दबाव डालने वाले लोग यह सोच ही नहीं रखते और ना ही उस रास्ते पर चल सकते हैं।
मैं यह स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूं कि देश की आर्थिक नीतियों में थोड़ा सा बदलाव करके बहुत आसानी से देश में गरीबी और बेरोजगारी समस्याओं को जड़ मूल से खत्म किया जा सकता है इसके लिए केवल देश की कर प्रणाली को बदलने की जरूरत है आज देश में आयकर सहित अनेकों प्रकार के कर लगाए गए हैं किंतु इससे देश की किसी भी आर्थिक समस्या का समाधान नहीं हो सकता लेकिन यदि इन सारे करो को हटाकर केवल देश के मुट्ठी भर अति संपन्न लोगों की संपत्ति पर संपत्ति कर लगा दिया जाए तो सारी समस्याओं का समाधान बहुत सरलता से ही किया जा सकता है।
इसलिए समाज का कल्याण चाहने वाले लोगों को इन तथ्यों पर ध्यान देना चाहिए कि समाचार माध्यमों द्वारा जो समाचार हम तक पहुंचाए जा रहे हैं उनके अनुसार देश में केवल 1% लोगों के पास देश की 73% संपत्ति है ऐसी स्थिति में अनेक प्रकार के कर लगाकर देश की गरीब और मध्यम जनता को का खून चूसने का कोई अर्थ नहीं है बल्कि केवल 1% लोगों की संपत्ति पर न्याय पूर्ण ढंग से संपत्ति कर लगाया जाना चाहिए एवं अन्य सभी प्रकार के तारों को पूरी तरह समाप्त कर देना चाहिए।
कोई भी चिंतनशील नागरिक इस बात को आसानी से समझ सकता है कि सब देश की संपत्ति का बहुत बड़ा भाग केवल 1% लोगों के पास है तो फिर बाकी लोगों के ऊपर किसी भी प्रकार का कर लगाने का क्या औचित्य है बल्कि केवल अति संपन्न लोगों पर संपत्ति कर लगाना ही हर दृष्टि से उचित हो सकता है लेकिन इस निर्णय तक पहुंचने में भी लोगों को क्यों कठिनाई हो रही है यह बात विचार नहीं है।
लेकिन अजीब बात है कि यह बात ना तो देश के बुद्धिजीवियों को समझ में आ रही है और ना ही राजनेताओं को इसका कारण क्या है। इसका उत्तर तो वही लोग दे सकते हैं लेकिन यदि बुद्धि और तर्क की बात को आगे बढ़ाया जाए तो अमीरी रेखा का निर्माण आज समाज की अपरिहार्य आवश्यकता बन चुकी है और इस पर संपूर्ण समाज की व्यापक सहमति बननी चाहिए और यदि इसमें कोई कमी दिखाई पड़ती है तो उस पर भी खुलकर चर्चा होनी चाहिए।

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