ब्याज से मुक्ति का सिर्फ एक उपाय





रोशन लाल अग्रवाल

अपना वश चलते हुए कोई भी व्यक्ति जाने या अनजाने में भी अपने साथ होने वाले किसी ज्ञात या अज्ञात अन्याय शोषण या बेईमानी को सहन नहीं करना चाहता लेकिन तब वह सहन करने के लिए मजबूर हो जाता है जब वह दूसरे व्यक्ति से बुद्धि शक्ति या ज्ञान के मामले में कमजोर पड़ता है। लेकिन सबसे कठिन स्थिति तब होती है जब उसके सामने इसे सहन करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं होता और दूसरा व्यक्ति उसे अपनी बात मानने के लिए मजबूर कर देता है। क्योंकि वह जानता है कि नहीं मानने पर उससे और भी अधिक नुकसान उठाना पड़ेगा। समाज भी इस शोषण को मानने के लिए मजबूर हो जाता है क्योंकि वह इससे बचने का कोई न्याय पूर्ण समाधान नहीं कर पाता।

वस्तुतः किसी भी समस्या का न्याय पूर्ण समाधान सोच और समझ पाना सबसे बड़ी समस्या है धीरे धीरे मनुष्य ने न्याय पूर्ण समाधान की समस्याओं को समझने और उनका हल करने कीवी पूरी कोशिश की है किंतु किसी कमजोर व्यक्ति द्वारा दूसरे मजबूत व्यक्ति से लिए जाने वाले ब्याज को रोकने का कोई सटीक समाधान खोज पाने में मनुष्य सफल नहीं हो पाया है और इसी के कारण समाज में अनेक भयानक विसंगतियां और विकृतियां दिखाई पड़ रही है।

समाज में फैली हुई भयानक विकृतियों को हम स्वीकार तो करते हैं किंतु इनका न्याय पूर्ण समाधान नहीं निकल पाया है दुनिया का कोई भी मानवतावादी इस बात को तो स्वीकार करता है कि ब्याज लेना अन्याय पूर्ण है किंतु इस का हल निकालना बिल्कुल अलग बात है।

इस समस्या का न्याय पूर्ण समाधान करने में पूरी मानवता की विफलता पूरी मनुष्यता के सामने भारी कीमत चुकाई है और इसे अनुचित मानते हुए भी इसे मानने के लिए मजबूर हो रहा हैऔर इसके बुरे प्रभावों को सहने के अलावा उसके सामने कोई रास्ता नहीं होता।

यह कठिन तम समस्या है ब्याज के स्वामित्व की। हर व्यक्ति जानता है कि ब्याज किसी व्यक्ति की मेहनत का परिणाम नहीं होता बल्कि यह दूसरे पक्ष की मजबूरी होता है किंतु इसे मान ना इसलिए पड़ता है क्योंकि ब्याज लेने वाले व्यक्ति के पास भी कुछ तर्क होते हैं जिनका कोई समाधान कारक उत्तर दूसरे पक्ष के पास नहीं होता। लेकिन इस मजबूरी की बहुत भयानक कीमत भी पूरी मानवता को चुकानी पड़ रही है।

आज भारी आर्थिक असमानता पूरी दुनिया की सबसे बड़ा और कठिन समस्या बनी हुई है इसने इतना विकराल स्वरूप ग्रहण कर लिया है कि इससे पूरी सामाजिक व्यवस्था का ताना-बाना पूरी तरह ध्वस्त हो रहा है लेकिन इससे मुक्ति का कोई उपाय भी दिखाई नहीं पड़ता।

समाज के सामने सबसे बड़ी समस्या है ब्याज के स्वामित्व की समस्या को हल करने की। यह तो सभी जानते हैं कि ब्याज पूंजी से होने वाली बिना परिश्रम की आय होती है किंतु ब्याज प्राप्त करने के लिए जिस पूंजी की आवश्यकता होती है उसे प्राप्त करने के लिए तो भारी परिश्रम करना ही पड़ता है।

सबसे बड़ी समस्या है व्यक्ति की स्वतंत्रता को मानने या नहीं मानने की एक विचारधारा यह तो मानती है कि हर व्यक्ति के स्वतंत्रता की एक समान सीमा होनी चाहिए किंतु उस की अधिकतम सीमा क्या होनी चाहिए तथा उससे अधिक सीमा पर क्या अंकुश होना चाहिए ताकि सब के साथ न्याय हो सके। अर्थात सब की समान स्वतंत्रता की रक्षा की जा सके लेकिन अधिक कार्य क्षमता रखने वाले व्यक्ति पर क्या अंकुश लगाया जाए जिससे कमजोर व्यक्ति को भी न्याय मिल सके।
इस समस्या का न्याय पूर्ण समाधान यह है कि हर व्यक्ति को जन्म सिद्ध समानता के आधार पर केवल औसत स्वतंत्रता प्राप्त करने का अधिकार होना चाहिए लेकिन सामाजिक व्यवस्था से मिलने वाले अतिरिक्त लाभ में भी हर व्यक्ति को उसका समान भाग मिलना चाहिए।

ब्याज वास्तव में सामाजिक व्यवस्था से मिलने वाला अतिरिक्त लाभ है और इसका व्यक्ति की बुद्धि या मेहनत से कोई संबंध नहीं है अर्थात कोई भी व्यक्ति बुद्धि या मेहनत के बिना भी ब्याज का अतिरिक्त लाभ उठा सकता है।

लेकिन न्याय की दृष्टि से किसी भी व्यक्ति को केवल औसत सीमा तक ही यह अतिरिक्त लाभ मिल सकता है क्योंकि औसत सीमा से अधिक पूंजी का स्वामित्व किसी भी व्यक्ति का नहीं हो सकता और यदि पूंजी पर स्वामित्व को सबसे अधिक संपत्ति का नहीं माना जा सकता तो एक व्यक्ति का ब्याज पर स्वामित्व भी इससे अधिक नहीं हो सकता और यही इस समस्या का न्याय संगत हल है।

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